दिन के बारह बज रहे थे। लेकिन रवि अभी भी सो रहा था। उसकी मां रमा ने आवाज दी।
रमा: “उठ जा बेटा, देख सूरज सर पर चढ़ आया है। कब तक सोता रहेगा?”
लेकिन रवि पर कोई असर नहीं हुआ। वह चादर से मुंह ढक कर दुबारा सो गया। कुछ देर बाद उसे खाने की खुशबू आने लगी। दाल में तड़का लगते ही उसे जोर से भूख लगने लगी। रवि उठा और सीधा मां के पास रसोई में पहुंच गया।
रवि: “मां, क्या बनाया है?”
रमा: “पहले जाकर नहा, फिर आना रसोई में। दाल-चावल बनाये हैं।”
दाल-चावल रवि को बहुत पसंद थे। वह फटाफट आंगन में गया और हैंडपंप से बाल्टी भरने लगा। इसी बीच उसे याद आया कि उसने दांत तो मांजे ही नहीं। उसने फटाफट मंजन लेकर दांतों को रगड़ लिया और मग में साबुन लेकर बैठ गया नहाने। जल्दी से नहा कर कपड़े पहन कर रसोई में पहुंच गया।
तब तक खाना तैयार हो चुका था। मां ने खाना परोस दिया। खाना बहुत ही स्वादिष्ट बना था। रवि ने भरपेट खाना खाया। वह खाना खाकर उठा तो मां ने टोक दिया –
रमा: “अब कहां चल दिया?”
रवि: “मां, लगता है खाना कुछ ज्यादा ही खा लिया। बहुत तेज नींद आ रही है, मैं तो सोने जा रहा हूं।”
रमा: “हे भगवान! अभी एक घंटे पहले ही तो सोकर उठा है। तुझे बस सारा दिन यही काम है, उठो, खाओ और सो जाओ। तुझे पता है तेरे पिता खेत में कितनी मेहनत करते हैं तब हमें दो वक्त की रोटी मिलती है। कुछ नहीं तो जाकर उनकी मदद ही कर दिया कर। उनके लिये खाना लेजा, मैं अभी तैयार कर रही हूं।”
रवि पर तो जैसे दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा।
रवि: “मां, तुम्हें पता है इतनी धूप में पहले एक बार मैं खाना देने गया था। आकर कितना बीमार पड़ गया था। तुम ही चली जाना, मैं तो सोने जा रहा हूं।”
रमा को बहुत गुस्सा आया। इससे पहले वह कुछ कहती, रवि तेजी से अपने कमरे में जाकर सो गया।
रवि के माता-पिता उसकी आलसी आदत से बहुत परेशान थे। वह कोई भी काम नहीं करता था, बस सारा दिन सोता रहता था। एक दिन रवि के पिता मोहन ने कहा –
मोहन: “बेटा, मैं खाद और यूरिया लेने शहर जा रहा हूं। दो दिन लग जायेंगे। फसल तैयार होने वाली है, तू सुबह खेत पर चले जाना और सारा दिन वहीं रहना। शाम को खाना खाकर रात को वहीं सोने चले जाना, कहीं कोई जानवर खेत में न घुस जाये या कोई और हमारी फसल को नुकसान न पहुंचा दे।”
रवि: “पिताजी, मुझसे ये सब नहीं हो पायेगा। आप मां को बोल दीजिये।”
मोहन: “नालायक, खेत की देखभाल आदमियों का काम होता है। अगर मुझे पता लगा कि तू खेत पर नहीं गया, या फसल को नुकसान हो गया, तो तेरी खैर नहीं।”
रवि डर गया। वह पिता के जाने के बाद मां से बोला –
रवि: “मां, सुबह जगा देना, नहीं तो पता नहीं पिताजी क्या करेंगे।”
अगले दिन, रमा ने रवि को सुबह चार बजे जगा दिया। रवि हाथ में फावड़ा लेकर खेत में पहुंच गया। वहाँ जाकर उसने देखा कि चारों ओर ठंडी हवा चल रही थी। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया। तभी उसे हल्की हल्की रोशनी नजर आई। पूरा खेत लाल रोशनी से भर गया। रवि ने यह सब पहली बार देखा था और आश्चर्य से देखता रहा। कुछ ही देर में सूरज उगने लगा। यह देख कर रवि को बहुत आश्चर्य हुआ।
कुछ ही देर में सभी गाँव वाले खेत में काम करने आ गये। सब अपने-अपने खेत पर काम कर रहे थे। रवि पेड़ के नीचे बैठा था। तभी उसके पास के खेत से माधव काका आये।
माधव काका: “रवि, मेरे खेत में पानी लग गया, अब तू अपने खेत में पानी काट ले।”
रवि: “काका, मुझे तो कुछ पता नहीं, ये सब तो पिताजी ने कभी नहीं बताया।”
माधव काका: “बेटा, कभी पिता के साथ खेत पर आया होता तो तुझे पता होता।”
माधव काका ने अपने बेटे को बुलाकर पानी रवि के खेत की ओर करवा दिया।
माधव काका: “जब पूरा खेत भर जाये तो हमें बता देना।”
रवि बैठकर देखता रहा। लेकिन सुबह जल्दी उठने के कारण उसे नींद आ गई। खेत में पानी बहुत ज्यादा भर गया।
तभी माधव काका दौड़ते हुए आये।
माधव काका: “नालायक, यहाँ सोने आया था? अपने पिता की सारी मेहनत बर्बाद कर दी, सारी फसल नष्ट हो गई।”
रवि हड़बड़ा कर उठा। उसका खेत पानी से लबालब भरा हुआ था। माधव काका ने जल्दी से पानी दूसरी ओर काटा। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लगभग आधी फसल खराब हो चुकी थी।
रवि: “काका, अब कुछ नहीं हो सकता क्या?”
माधव काका: “नहीं बेटा, तैयार फसल का ध्यान बच्चे की तरह रखना पड़ता है। समय से पानी देना, खाद देना, जानवरों से बचाना। इसलिए हम दिन रात खेत पर रहते हैं। अब तो भगवान ही मालिक है।”
रवि पेड़ के नीचे बैठा रोता रहा।
दोपहर को रमा खाना लेकर आई। उसे सब पता चला तो उसने भी रवि को बहुत डाँटा।
शाम को रवि घर नहीं आया, न ही उसने खाना खाया। उसकी भूख-प्यास, नींद सब उड़ चुकी थी।
अगले दिन जब मोहन घर वापस आये तो उन्होंने रवि के बारे में पूछा –
रमा ने सारी बात बता दी। मोहन सब छोड़कर दौड़ते हुए खेत पर पहुंचे। उन्होंने देखा, रवि पेड़ के नीचे बैठा रो रहा था। आधी फसल खराब हो चुकी थी।
रवि: “पिताजी, मुझे माफ कर दीजिये। मेरे आलस ने इतना बड़ा नुकसान कर दिया। आप चाहें तो मुझे पीट लीजिये।”
मोहन: “नहीं, तुझे मारने से फसल ठीक नहीं होगी। वादा कर, आज के बाद कभी आलस नहीं करेगा। चल, अब घर चल, वहीं बात करेंगे।”
दोनों घर आ जाते हैं। रवि की आँखों से अब भी आँसू बह रहे थे।
रमा ने उसे खाना दिया। लेकिन उसने नहीं खाया और वह अपने कमरे में जाकर रोने लगा।
रमा: “जी, अब क्या होगा? आधी फसल तो बर्बाद हो गई।”
मोहन: “रमा, कोई घाटे का सौदा नहीं है। आधी फसल देकर अगर बेटा सुधर गया, तो यही काफी है।”
मोहन ने रवि को बुलाया –
मोहन: “बेटा, अब तो नुकसान होना था हो गया। अब हमें कल से आधे खेत की फसल उखाड़ कर दुबारा बोनी होगी।”
रवि: “पिताजी, आप बाकी आधे खेत में खाद-यूरिया लगा कर उसे काटने का इंतजाम कीजिये। मैं इस पर अकेले काम करना चाहता हूँ।”
अगले दिन सुबह चार बजे रवि अपने पिता के साथ खेत पर पहुँच गया और पिता के बताये अनुसार खेत पर काम करने लगा। चार महीने कठिन परिश्रम करने के बाद नई फसल कुछ बढ़ती हुई दिखाई देने लगी। रवि अब एक कर्मठ, मेहनती इंसान बन चुका था।
निष्कर्ष
रवि की कहानी हमें सिखाती है कि आलस का अंजाम हमेशा बुरा होता है और मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है। आलस छोड़कर मेहनत को अपनाने से जीवन में सफलता और संतोष मिलता है। रवि ने यह साबित कर दिखाया और अपने जीवन को एक नई दिशा दी।
इस कहानी को पढ़कर बच्चे सीख सकते हैं कि कैसे आलस छोड़कर मेहनत और समर्पण से सफलता प्राप्त की जा सकती है। यह कहानी विशेष रूप से ‘vaida.in‘ के लिए लिखी गई है, ताकि बच्चों को प्रेरित किया जा सके और उन्हें जीवन में सही रास्ते पर चलने की शिक्षा दी जा सके।
